पुरुष विद्वेष समाज के लिए घातक क्यों ?

वर्तमान में पुरुष अधिकार आन्दोलन के सामने जो मुख्य समस्याएं है वो है , पुरुष सम्बंधित , विषयों , समस्याओ और अधिकारों के बारे में जागरूकता न होना। पुरुष अधिकारों का मर्म , सामाजिक मानसिकता से पुरुष विद्वेष का उन्मूलन है। हमारी वर्तमान मानसिकता पुरुषों को बहुत ज्यादा जांचती परखती है। यह पुरुषों पर अपेक्षाओं का भारी बोझ डाल देती है तथा उन्हें बहुत कम स्वीकार्यता प्रदान करती है। निम्न कथन से यह बात साबित होती है -
" पुरुष से अपेक्षा की कोई सीमा नहीं है और पुरुष की परिसीमा की स्वीकार्यता नहीं होती "
यह मानसिकता पुरुषों के शातिपूर्ण अस्तित्व के लिए घातक है तथा पुरुष समाज पर हिंसक होने के लिए दबाव डालता है। विडंबना तब होती है जब इस हिंसा के लिए पुरुष को ही दोषी माना जाता है। यह भूलकर की सामाजिक संरचना ने ही पुरुष को रक्षक की हिंसक भूमिका प्रदान की है। यदि हम हिंसा समाप्त करना चाहते हैं तो हमे पुरुष की रक्षक भूमिका से हटाकर सोचना होगा।
हालांकि , मौजूदा सामाजिक चलन कुछ और ही कहता है। हर जगह हमे पुरुष की हिंसक, रक्षक भूमिका का महिमामंडन मिलता है। चाहे वो जिलेट का "सोल्जर फॉर वुमन" का विज्ञापन हो या ICICI का विज्ञापन "बन्दे अच्छे हैं" हो।
और इस हिंसक, रक्षक भूमिका में एक पुरुष को दूसरे पुरुष से लड़ना ही पड़ता है। यह अपेक्षा एक पुरुष को दूसरे पुरुष के प्रति संवेदनहीन बनाती है और दूसरे पुरुष की पीड़ा का कारण बनती है। यह समाज में पुरुष बंधन पर सीधा आक्रमण करता है तथा हर पुरुष को दूसरे से सावधान करता है।
यह तर्क महिला तक नहीं जाता क्योंकि महिला से रक्षा करने की अपेक्षा नहीं की जाती। इसलिए जब कोई महिला अपराध करती है तो या तो न्यायालय उसे क्षमा कर देता है या कोई छोटी सजा देता है। सबसे बड़ी विडंबना है कि इस वयवहार को सामाजिक स्वीकृति प्राप्त है तथा महिला अपराधी को माफ़ करना कभी राष्ट्रीय रोष का या विरोध का विषय नहीं बनता।
यहाँ तक कि जब कोई पुरुष झूठे आरोप के चलते आत्महत्या कर लेता है तो भी समाज को कष्ट नहीं होता। पुरुष विद्वेष इतने स्तर तक है कि किसी निर्दोष पुरुष की मृत्यु हमे पीड़ा तक नहीं देती। समाज में उस पुरुष को इन्साफ दिलाने के लिए कोई हाय तौबा नहीं मचती , न ही उस अत्याचारी महिला को सज़ा दिलाने में कोई दिलचस्पी होती है जिसकी वजह से उस पुरुष की मृत्यु हुई। कुछ समूह को छोड़कर जो कि व्यथित और पीड़ित पुरुषों की लड़ाई लड़ रहे है ( सेव इंडियन फॅमिली मूवमेंट) , कुल मिलाकर समाज को एक मृत पुरुष के लिए कैंडल मार्च निकलने की इच्छा तक नहीं होती
इस तरह की कई घटनाएँ यह साफ तौर पर दिखाती हैं कि समाज पुरुष के प्रति कितना निर्दयी है। और यह चलन घातक है। यह समाज में अपराध को बढ़ावा देता है तथा समाज को अस्तव्यस्तता की ओर ले जाता है। पुरुष को अपनी समस्या बताने तथा सहयोग पाने में कठिनाई होती है क्योंकि पुरुष विद्वेषी समाज ऐसी कोई दोस्ताना संवाद की जगह बना ही नहीं पाया है , जहाँ पुरुष खुलकर अपनी बात कह सके। यही कारण है की ज़्यादातर पुरुष कुंठाग्रस्त हो जाते हैं , घुटन महसूस करते हैं और अपनी सारी भावनाएं , ज़ज्बात , पीड़ा , व्यथा अपने अन्दर ही छुपा लेते हैं।
अक्सर जब पुरुष से भारी जोखिम ( वैयक्तिक , भौतिक , वितीय ) उठाने की अपेक्षा की जाती है और वो जब इसमें सहज महसूस नहीं करता तो उसे उपभोग्य वस्तु समझ लिया जाता है , उसे छोटा साबित किया जाता है , मजाक उड़ाया और अपमानित किया जाता है। ऐसा सामाजिक रूप से स्वीकार्य बर्ताव पुरुषों को कुंठित तथा उपेक्षित बनाता है। यह पुरुष में अपराधी प्रवृति की जड़ है , जब उसे प्रताड़ित किया जाता है तथा कहीं राहत नहीं मिलती तो वह अपराध करके पूरी प्रक्रिया से बदला लेता है। इस अपराध के पीछे यह बताने की निराशोन्मत्त कोशिश होती है कि कैसे उसे गलत साबित किया गया।
लेकिन चूकि पूरा समाज पुरुष विद्वेष से ग्रस्त है तो ऐसे किसी भी प्रयास को अपराध ही समझा जाता है और पुरुषों को सजा देकर पुरुष विरोधी प्रावधानों को बढ़ावा दिया जाता है। इस बात को समझने में सिस्टम बिलकुल असफल होता है कि अपराध "पुरुष द्वारा प्रताड़ना नहीं बल्कि पुरुष की प्रताड़ना है", और कुछ पुरुषों द्वारा अपराध पुरुष अधिकारों के अभाव में हो रहा है न कि "पुरुष विशेषाधिकारों" के कारण।सबसे बुरा यह है कि इस पुरुष विद्वेष के कारण एक महिला द्वारा छोटा सा आरोप भी पुरुष को गहरी परेशानी में डाल देता है।
यह अपराधिक मनोवृत्ति को बढ़ावा देने का काम करती है कि "जब मुझे अपराधी माना ही जा रहा है तो क्यों न अपराध कर ही दिया जाये?" यही इनफ़ोसिस के अमित बुद्धिराजा तथा सतीश गुप्ता ने किया , कड़कडडूमा के पवन कुमार ने तथा देओली के प्रदीप जैन ने किया। इन सबको उनकी पत्नियों ने प्रताड़ित किया था या तो झूठा दहेज़ का केस करके या फिर झूठे केस की धमकी देकर। इससे क्षुब्द होकर इन लोगों ने कानून अपने हाथ में लिया और अपनी पत्नियों की हत्या कर दी। सतीश को छोड़कर बाकी सबने बाद में आत्महत्या कर ली।
यह और इस तरह के कई उदाहरण समाज में अपराध का उदभव दिखाते हैं। इनमे से से कोई भी पेशेवर अपराधी नहीं थे फिर भी इनको अपराध करने पर किसने मजबूर किया ? यह समाज की पुरुष विरोधी मानसिकता है जो पुरुष को जब तक निर्दोष साबित न हो जाये तब तक उसे हर अपराध के लिए उत्तरदायी बना देती है। एक झूठा आरोप और पुरुष के जीवन पर फांसी का फंदा लटकने लगता है।
वे पुरुष भी जो अपराध करते हैं क्या जन्मजात अपराधी होते हैं? नहीं, पर समाज उनपर पुरुषत्व हासिल करने का दबाव बनाता है जैविक तौर पर नहीं बल्कि सामाजिक तौर पर। जबकि लड़कियों को यह जैविक तौर पर ही प्राप्त हो जाता है कमाना नहीं पड़ता। यह दुहरा बर्ताव लडको में भय की मनोविकृति पैदा करता है जिससे वो भावनात्मक रूप से कमज़ोर हो जाते हैं।
यही पर उस पुरुष पर सामाजिक दबाव होता है कि वो एक मज़बूत रक्षक बने , वो अंदरूनी रूप से टूट चूका होता है। वो इस खंडित , कमज़ोर, विकृत भावनात्मक मानसिकता के साथ भौतिक रूप से मज़बूत होने के दबाव से जूझ रहा होता है।
निश्चित रूप से इस पुरुष की कोई भी भावनात्मक प्रताड़ना उसे हिंसक प्रतिक्रिया देने पर मजबूर करेगी , और फिर हम कहते हैं कि पुरुष अपराधी होता है तथा वह अपराध करता है। इस तथ्य को भूल जाते हैं हम कि "समाज अपराध को बनता है पुरुष तो उसको बस उसको कर देता है।"
अगर हम चाहते हैं कि अपराध घटे तो पुरुष को सज़ा देना छोड़कर हमे समाज में अपराध का सृजन बंद करना होगा। हमे लडको के साथ दुर्व्यवहार बंद करना होगा और उनको मर्दानगी कमाने का दबाव देना बंद करना होगा। आदर, पुरुषों की दुनिया में मुश्किल से मिलने वाला संसाधन नहीं होना चाहिए जिसे केवल सामाजिक उपलब्धियों द्वारा प्राप्त किया जा सके। जिसके कारण एक पुरुष को दूसरे पुरुष से नफरत करना अनिवार्य हो जाता है।
पुरुष विद्वेष समाज के लिए घातक है और यह समाज से कभी अपराध मिटने नहीं देगा। चुनाव समाज के सामने है - क्या यह समाज पुरुष विद्वेष को जारी और अपराध को स्थिर रखना चाहता है या फिर पुरुष कल्याण की दिशा में काम करना चाहता है जिससे की अपराध को कम किया जा सके।

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